नसबंदी के टारगेट में स्वास्थ्य विभाग बहुत पीछे, अब तक हुए सिर्फ 6200 केस

ग्वालियर। प्रतिवर्ष की तरह इस बार भी नसबंदी का टारगेट पूरा करने से पहले ही स्वास्थ्य विभाग का अमला हांफ गया है। ग्रामीण क्षेत्र में करीब 62 प्रतिशत केस हुए हैं, जबकि शहरी क्षेत्र में आंकड़ा महज 38-40 प्रतिशत का है। दिलचस्प बात ये है कि यदि स्वास्थ्य विभाग की वेबसाइट पर भरोसा किया जाए तो महज 3625 नसबंदी ऑपरेशन ही हुए हैं, हालांकि स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी इसका कारण नसबंदी कराने वाले को भुगतान नहीं होना बता रहे हैं।

स्वास्थ्य विभाग के लिए नसबंदी के टारगेट को हासिल करना हमेशा ही परेशानी का सबब रहता है। हालांकि पिछले कुछ समय से लोगों में जागरूकता आई है, इसलिए आंकड़ों में भी थोड़ा सुधार हुआ है। इसके बाद भी टारगेट पूरा करना अब भी मुश्किल बना हुआ है। 2016-17 में टारगेट 9120 का था, जबकि नसबंदी ऑपरेशन महज 3524 हुए थे। इस वर्ष का टारगेट 12 हजार रखा गया था, जबकि महज 6200 केस हुए हैं। हालांकि यदि स्वास्थ्य विभाग की वेबसाइट को सही माना जाए तो केवल 3625 नसबंदी ऑपरेशन ही हुए हैं। इसमें भी ग्रामीण क्षेत्र में 62 प्रतिशत और शहरी क्षेत्र में करीब 38-40 प्रतिशत केस हुए हैं।

शहर में क्यों कम

शहरी क्षेत्र में रहने वाले नसबंदी की जगह गर्भ निरोधक साधनों का अधिक इस्तेमाल करते हैं। क्योंकि शहर में हर मेडिकल स्टोर पर ये साधन आसानी से उपलब्ध हैं। जबकि ग्रामीण क्षेत्र में अशिक्षा के साथ ही संसाधनों का भी अभाव रहता है।

वेबसाइट और हकीकत में अंतर क्यों

स्वास्थ्य विभाग की वेबसाइट पर किसी भी केस को तभी दर्ज किया जाता है, जबकि नसबंदी ऑपरेशन के बाद संबंधित व्यक्ति को राशि का भी भुगतान हो जाए। स्वास्थ्य विभाग के अकाउंट सेक्शन में अक्सर भुगतान के मामले अटके रहते हैं। इसी वजह से केस तो हो जाते हैं, लेकिन भुगतान नहीं होने से वेबसाइट पर आंकड़े नहीं चढ़ते हैं।

एक कारण ये भी

ग्रामीण क्षेत्र में आशा ऊषा कार्यकर्ताओं के साथ ही आंगनबाड़ी कार्यकर्ता भी घर-घर जाकर लोगों को फैमिली प्लानिंग का महत्व समझाती हैं। इसके अलावा गर्भवती महिला को घर से अस्पताल तक ले जाने की जिम्मेदारी भी निभाती हैं। परिवार से जुड़ाव हो जाने के कारण आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की बात को लोग गंभीरता से लेते हैं और इसी वजह से अधिक ऑपरेशन होते हैं। जबकि शहरी क्षेत्र में केवल अस्पतालों में ही लोगों को सलाह दी जाती है, आशा, ऊषा या आंगनबाड़ी कार्यकर्ता कभी घर में जाकर लोगों को इस बारे में प्रोत्साहित नहीं करती हैं।

इनका कहना है

नसबंदी के टारगेट के मुकाबले अब तक करीब 6200 नसबंदी केस हो चुके हैं। इसमें ग्रामीण क्षेत्र में करीब 62 प्रतिशत केस हुए हैं – डॉ. मनोज कौरव, जिला स्वास्थ्य अधिकारी

 

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