वैज्ञानिकों ने की खोजी ये तकनीक, कैंसर के रोगियों को मिलेगी सुविधा

न्यूयॉर्क: मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी (एमआईटी) के अनुसंधानकर्ताओं ने कैंसर के इलाज के लिए मशीन लर्निग की एक नई तकनीक विकसित की है, जिससे घातक मस्तिष्क कैंसर के लिए कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी के दुष्प्रभावों को कम किया जा सकता है. अनुसंधानकर्ताओं में एक भारतवंशी भी शामिल है. ग्लियोब्लास्टोमा एक घातक ट्यूमर है, जो मस्तिष्क या रीढ़ की हड्डी में होता है और इससे पीड़ित मरीज पांच साल से ज्यादा नहीं जी पाते हैं. ऐसे मरीजों को आमतौर पर दवाओं का काफी सुरक्षित खुराक दिया जाता है, फिर भी उनपर दवाओं का दुष्प्रभाव होने का खतरा बना रहता है. लेकिन नई सेल्फ लर्निग मशीन लर्निग तकनीक से दवाओं की खुराक दिए जाने से उसका दुष्प्रभाव कम हो सकता है.

वैज्ञानिकों ने की खोजी ये तकनीक, कैंसर के रोगियों को मिलेगी सुविधा

अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि परंपरागत उपचार विधि की तुलना में नई उपचार तकनीक में मरीजों को खतरे की आशंका कम रहती है, जबकि फायदा अधिक होता है. अमेरिका के बोस्टन स्थित एमआईटी के प्रमुख अनुसंधानकर्ता पारीख शाह ने कहा, “हमारा लक्ष्य मरीजों के ट्यूमर के आकार को घटाना है .  साथ ही हम यह भी सुनिश्चित करना चाहते हैं कि मरीजों पर इसका दुष्प्रभाव भी कम हो. ”

परीक्षण के दौरान 50 मरीजों पर इसका प्रयोग किया गया, जिसमें उपचार के दौरान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एजेंट का उपयोग कर दवा की खुराक को तकरीबन एक-चौथाई या आधी मात्रा कर दी गई, जबकि ट्यूमर के आकार में काफी कमी आई.

विटामिन थेरेपी कम कर सकती है त्वचा कैंसर का खतरा
वैज्ञानिकों के अनुसार विटामिन बी3 के रूप में इस्तेमाल की जाने वाली थेरेपी संभवत: मेलेनोमा नामक घातक त्वचा कैंसर के खतरे को कम कर सकती है. इन वैज्ञानिकों में भारतीय मूल का एक वैज्ञानिक भी शामिल है. ऑस्ट्रेलिया के सिडनी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पाया कि निकोटिनामाइड, डीएनए में हुई क्षति, सूजन और पराबैंगनी विकिरण की वजह से कम हो रही रोग- प्रतिरोधक क्षमता घटाने और उसे उलटने में मदद कर सकता है.

शोधकर्ताओं ने कहा कि डॉक्टर की सलाह पर हर दिन एक ग्राम निकोटिनामाइड लेने पर इसका प्रति माह खर्च 10 अमेरिकी डॉलर आता है. उन्होंने कहा कि मेलेनोमा की रोकथाम के लिए इसकी क्षमता तथा सुरक्षा को निर्धारित करने के लिए यादृच्छिक प्लेसबो नियंत्रित परीक्षण अब जरूरी है.पराबैंगनी विकिरण (यूवीआर) मेलेनोसाइट्स में डीएनए को क्षति पहुंचाता है. शोधकर्ताओं ने बताया कि निकोटीनमाइड (विटामिन बी 3) डीएनए की क्षति को ठीक करता है, यूवीआर द्वारा जो सूजन होती है उसे नियंत्रित करता है और यूवी किरणों से रोग-प्रतिरोधक क्षमता में आने वाली गिरावट को कम करता है.

source : zeenews

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