क्या आपको भी आते हैं मिर्गी के दौरे..? अगर हां तो हो जाइए सावधान..! दवाइयां नहीं कर रही असर..

    0
    262

    जोधपुर

    डॉ. सम्पूर्णानंद मेडिकल कॉलेज के शिशु रोग विभाग ने मिर्गी रोग के मामले में बड़ी खोज की है। डॉक्टरों ने मिर्गी रोग से ग्रसित 260 बच्चों पर शोध के बाद यह पाया कि इन बच्चों में मिर्गी रोग की रोकथाम के लिए दी जाने वाली दवाई की वजह से ही उन्हें लगातार दौरे या ताण (फिट्स) पड़ रहे हैं। मिर्गी की दवाई शरीर में फोलिट (फोलिक एसिड) को कम कर देती हैं, जिससे दौरे आते रहते हैं। फोलिक एसिड देने पर दौरे धीरे-धीरे बंद हो गए। चिकित्सकों का दावा है कि यह खोज पूर्णतया नवीन है।

    मेडिकल कॉलेज के शिशु रोग विभाग के न्यूरो फिजिशियन डॉ. मनीष पारख के नेतृत्व में चार डॉक्टरों की टीम ने दो साल पहले इस बीमारी पर शोध शुरू किया। शोध में 6 महीने से लेकर 18 साल तक के एेसे बच्चों का चुनाव किया गया, जिनको मिर्गी रोग के साथ नियमित दवाई लेने के बावजूद ताण आ रही थी। डॉक्टरों ने दवा की डॉज बदलकर देखी, मगर सफलता नहीं मिली। आखिर रक्त जांच में फोलिट कम पाए जाने और उसके बढ़ाने पर इसके सकारात्मक प्रभाव सामने आए। बच्चों के इस शोध को वयस्क पर भी लागू किया जा सकता है। शोध में डॉ. बिंदु देवपा, डॉ. पवन दारा, डॉ. श्यामा चौधरी और पैथोलॉजी विभाग से डॉ. देवेश शामिल थे।

    क्या करता है फोलिक 

    रक्त में सामान्यत: 15 नैनोग्राम प्रति मिलीलीटर फोलिट होता है जो ताण बढ़ाने वाले न्यूरोकेमिकल ग्लूटामेट और कम करने वाले गाबा न्यूरोकेमिकल के मध्य संतुलन रखता है। इसकी मात्रा 10 से कम होते ही ताण आने की आशंका बढ़ जाती है। कई बच्चों में यह 3 से 4 ही मिला। फोलिक एसिड की दवाइयां देकर बच्चों में फोलिट बढ़ाने के बाद उनकी ताण की अवधि व संख्या कम हो गई। अधिक फोलिक एसिड भी ‘खतरनाकÓचौंकाने वाला तथ्य यह भी सामने आया कि शरीर में फोलिक एडिस कम होने पर ही नहीं, इसकी मात्रा अधिक भी नहीं होनी चाहिए। डॉक्टरों का कहना है कि अधिक फोलिक एसिड देने से भी ताण आ सकती है। एेसे में फोलिट जांच के बाद ही इसकी दवाई शुरू करनी चाहिए।

    एेसे लगाया दिमाग मिर्गी की दवाई लेने के बावजूद ताण आना हमारी समझ से परे था। एक दिन मेरे दिमाग में ख्याल आया कि सेरिब्रल फोलिट डेफिशिएंसी नामक जन्मजात बीमारी में भी फोलिट कम होता है और ताण आती है। यह तो पहले से ही पता था कि मिर्गी की दवाई फोलिट की मात्रा को कम करती है। यहीं से शोध सही दिशा में आगे बढ़ता गया और दो साल बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंच गए।

    डॉ. मनीष पारख, न्यूरो फिजिशियन (शिशु रोग), डॉ. एसएन मेडिकल कॉलेज

    Share and Enjoy !

    0Shares
    0 0