Antibiotic (एंटीबायोटिक) का अत्यधिक उपयोग कहीं बन न जाए विपदा

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मामूली जुखाम-बुखार में भी Antibiotic (एंटीबायोटिक) का प्रयोग अब चिंतनीय स्तर पर पहुंच गया है। देश में केन्द्र सरकार राज्यों को एंटीबायोटिक दवाओं के दुरुपयोग को रोकने के लिए दिशा-निर्देश जारी करने जा रही है। वहीं केमिस्ट से बिना परची के सीधे एंटीबायोटिक की खरीद पर रोक लगाने जा रही है। एंटीबायोटिक का अत्यधिक उपयोग अब चिंतनीय स्तर पर पहुंच चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में आगाह किया जा चुका है कि, एंटीबायोटिक के अतिउपयोग जनस्वास्थ्य के लिए बड़ा वैश्विक खतरा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व के 22 देशों में 5 लाख लोगों में एंटीबायोटिक प्रतिरोध पाया जा चुका है। देश में 10 में से 3 बच्चों में यह समस्या है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में हिस्सा लेने आए 2005 के बैक्टिरीयम हेलीकोबैक्टर की खोज के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. जान रोबिन वारेन ने चिकित्सकों और दुनिया की सरकारों को चेताया है कि, एंटीबायोटिक का अत्यधिक प्रयोग रोको वरना ‘‘विपदा” निश्चित है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि, जब जरुरत ना हो तो चिकित्सकों को एंटीबायोटिक्स नहीं लिखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि, अभी यह विपदा नहीं है पर वह दिन दूर नहीं जब यह विपदा के रुप में सामने आ जाए। अभी भी समय है हमें चेत जाना चाहिए।

हांलाकि, एंटीबायोटिक्स का उपयोग सारी दुनिया की समस्या है,  पर इसे नहीं नकारा जा सकता कि, दुनिया में सबसे अधिक दवाओं का उपयोग करने वालों की सूची में हमारे देश का नाम प्रमुखता से शामिल है। दवाओं के अत्यधिक उपयोग के कारण शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने से दवाओं का असर कम होने लगता है। हमारे देश के दवाओं की बिक्री के आंकड़े भी देखे तो बिना जरुरत के ही शक्तिवर्द्धक टॉनिक, खांसी के पीने की दवा और विटामिनों की सर्वाधिक बिक्री होती है। दवाओं का अत्यधिक प्रयोग इन दवाओं का असर कम करता है, वहीं बिना आवश्यकता के इन दवाओं के लेने से यह दवाएं असरकारक भी नहीं होती। एक रिपोर्ट के अनुसार हैजा, मैनेनजाइटस, टीबी और एचआईवी जैसी बीमारियों में गलत या अत्यधिक इस्तेमाल होने वाले एंटीबायोटिक्स के कारण रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आ रही है। दुनिया के कई देशों ने इस विषय में बार-बार चेताया भी है। हांलाकि सलाहकार समिति की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए सरकार नए सुधारात्मक कदम उठाने जा रही है।

सरकार के आदेशों के अनुसार, केमिस्ट चिकित्सक की परची के आधार पर ही दवाएं उपलब्ध करा सकता है। पर असल में होता ऐसा नहीं है। दवा की दुकान पर जाकर बुखार, खांसी, पेट दर्द, सिर दर्द व विटामिन आदि तो बिना डॉक्टर की परची के ही ले आते हैं। केमिस्ट भी अधिक लालच के चक्कर में स्थानीय व महंगी दवाएं थमा देते हैं, जिसका असर धीरे-धीरे कम होने लगता है। औषधि व प्रसाधन सामग्री अधिनियम के परिशिष्ट व अनुसूची में Antibiotic दवाओं सहित 536 दवाएं शामिल है। प्रावधानों के अनुसार इस सूची में शामिल दवाओं को बिना चिकित्सकीय परची के केमिस्ट देता है तो, यह आपराधिक कृत्य है। कुछ चिकित्सकों द्वारा भी परची पर लंबी फेहरिस्त बनाने व दवा निर्माताओं के हितों को साधने के चक्कर में अनावश्यक व अत्यधिक मात्रा में दवाएं लिख दी जाती है। इसी तरह से हमारी मानसिकता भी यह हो गई है कि, जब तक डॉक्टर दवाओं की लंबी फेहरिस्त नहीं संभला दे तब तक विश्वास ही नहीं होता कि ईलाज सही किया जा रहा है। ऐसे में हमें धैर्य व चिकित्सकीय परार्मश को मानते ही मानसिकता में बदलाव लाना होगा।

दूसरा पक्ष यह भी है कि, एंटीबायोटिक्स व अन्य दवाओं के अत्यधिक उपयोग पर पर्याप्त चिकित्सकीय सहयोग नहीं मिलने से भी कारगर रोकथाम नहीं हो पा रही है। दुर्भाग्य जनक यह भी है कि, आजकल समाचार पत्रों व चैनलों पर दवाओं के भी विज्ञापन प्रमुखता से आने लगे हैं। इससे बिना चिकित्सकीय परामर्श के भी दवाएं खासतौर से शक्तिवर्द्धक या इसी तरह की अन्य दवाओं का उपयोग तेजी से बढ़ा है। हांलाकि सरकार की चिंता इससे स्पष्ट हो जाती है कि, सलाहकार समिति की सिफारिशों के अनुसार, डॉक्टरों द्वारा लिखी जाने वाली दवाओं की परची के डुप्लीकेट यानी दो प्रतियों में लिखने का नियम लागू करने का विचार है। इससे एक परची केमिस्ट के पास रह जाएगी। हांलाकि सरकारी दवाखानों में खासतौर से राजस्थान में तो सरकारी चिकित्सकों को मुफ्त दवा योजना के कारण प्रेसकेप्सन दो प्रतियों में लिखना आरंभ हो गया है। इससे समय- समय पर दवाओं के लिखने की मोनेटरिंग हो सकेगी वहीं केमिस्टों के पास परची रखना आवश्यक होने से बिना परची के दवाओं की बिक्री पर रोक लग सकेगी।

विश्व स्वास्थ्य संगठन आगाह कर चुका है। विशेषज्ञ समिति दवाओं के कम से कम उपयोग की सलाह दे चुकी है। सरकार जेनेरिक दवाओं का उपयोग बढ़ाने के लिए प्रयासरत है। प्रधानमत्री जनऔषधी योजना को विस्तारित किया जा रहा है। पर इसके लिए चिकित्सक जेनेरिक दवाएं लिखे, राज्य सरकारों द्वारा जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता व वितरण व्यवस्था कारगर हो। विशेषज्ञ समिति ने चिकित्सकों द्वारा लिखी जाने वाली परचियों का भी समय-समय पर मॉनिटरिंग करने के साथ ही एकाध सख्त कदम भी उठाने होंगे वहीं औषधि निर्माताओं के लिए भी दवा पर आरएक्स लिखने के साथ ही यह लिखने की भी सलाह दी जाये कि, पंजीकृत डॉक्टरों की परची पर ही दवाएं बेची जाए। दवाओं के अनावश्यक उपयोग पर रोक और सबके लिए सहज इलाज की दिशा में निश्चित रुप से सरकार के यह प्रयास कारगर सिद्ध होंगे। सरकार को इस दिशा में त्वरित कदम उठाने की पहल तो की है अब देखना यह है कि, यह पहल कितनी कारगर हो पाती है।

rajexpress

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